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इस प्रसिद्ध महिला एथलीट के शरीर में पुरुषों जैसे गुप्तांग, पोस्टमॉर्टम के बाद दुनिया ने जाना

Posted On: 28 Jul, 2016 Sports and Cricket में

Shilpi Singh

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खेलों के महाकुंभ ओलंपिक में जाने का सपना हर वह खिलाड़ी देखता है जिसने खेल को अपना कॅरियर चुना है. हालांकि हर बार ओलंपिक में कुछ ना कुछ विवाद उत्पन हो ही जाते हैं. कभी डोप टेस्ट तो कभी कुछ और, लेकिन सबसे ज्यादा ओलंपिक में जिस चीज को लेकर विवाद रहा है वह है लिंग परीक्षण. आइए जानते हैं आखिर क्यों ओलंपिक में होता है लिंग परीक्षण है और इस परीक्षण ने कितने  खिलाड़ियों के कॅरियर को किया खराब.


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क्यों होता है ओलंपिक में लिंग परीक्षण

हर बार ओलंपिक में एक बात देखने को मिलती है वो है महिलाओं का लिंग परीक्षण. दरअसल जब भी कोई महिला किसी खेल में जीतती है उसके बाद उसपर ये आरोप लगते हैं कि वो पुरूष हो सकती है, इसलिए अक्सर उनका लिंग परीक्षण करवाया जाता है, जो अपने आप में बहुत शर्म की बात है.


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1936 के बर्लिन ओलंपिक में सबसे पहला लिंग परिक्षण

1936 के बर्लिन ओलंपिक में एक ऐसी घटना घटी जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी. 100 मीटर की रेस में जब स्टेला वॉल्श हारकर दूसरे स्थान पर आई तो उनके समर्थकों को विश्वास नहीं हुआ. उन्होंने पहले स्थान पर आई अमेरिकी हेलेन स्टीफंस पर ये आरोप लगाया कि वह एक पुरूष हैं. लेकिन जब हेलेन स्टीफंस पर टेस्ट किए गए तो उसमें वह बरी हो गई. हालांकि यह मामला यहीं नहीं रुका. जब 1980 में स्टेला वॉल्श की मौत हुई तब  उनका पोस्टमॉर्टम कराया गया. उस दौरान दुनिया को पता चला कि स्टेला वॉल्श के शरीर में आनुवांशिक कारणों से पुरुषों जैसे जननांग थे.


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1946 में फिर उठा लिंग परीक्षण का मुद्दा

1946 में टोक्यो मे चल रहे ओलंपिक में उस वक्त खलबली मच गई, जब पोलिश की एक धावक इवा को लिंग परीक्षण से होकर गुजरना पड़ा. दरअसल इस धावक ने एक गोल्ड और एक रजत पदक अपने नाम किया था. जिसके बाद उनपर यह आऱोप लगे की वह एक पुरूष हैं. जब उनके लिंग की जांच हुई तो उन्हें पुरूष करार देते हुए उनसे मेडल ले लिए गए. लेकिन लोगों को हैरानी तब हुई जब वह एक बच्चे की मां बनी. इसके बाद ओलंपिक फेडरेशन को काफी आलोचनाएं झेलनी पड़ी थी.


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भारत भी नहीं रहा अछूता….

दुती चंद

18 साल की उम्र में जब इस भारतीय महिला धावक ने 100 मीटर और 200 मीटर में नेशल चैंपियन और एशियाई खेलों में पदक जीता, तो भारत को ओलंपिक में एक मेडल की आस बंधी. लेकिन ठीक ओलंपिक से पहले जब इनका लिंग परीक्षण किया गया तो दुती उसमें असफल रही, जिसके तुरंत बाद इनका नाम वापस ले लिय गया. हालांकि उन्होंने इस बात को गलत साबित करने के लिए केस लड़ा और वह इस केस को सफलतापूर्वक जीत भी गई. इस साल वह रिओ में होने वाले ओलंपिक में भारत के लिए एक मेडल लेकर आएं सबकी यही चाहत है.

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शांति सुंदरराजन

शांति सुंदरराजन ने 2006 में आयोजित दोहा एशियाड में 800 मीटर की दौड़ में देश को रजत पदक ‌दिलाया था, लेकिन इसके बाद लिंग परीक्षण मेंं वे फेल हो गईं. लिंग परीक्षण में फेल होते ही ऐथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया ने शांति पर प्रतिबंध लगा दिया. शांति अपनी आजीविका के लिए मजदूरी करने को विवश है. उनके सारे रिकॉर्ड मिटा दिये गए हैं. हालांकि आज भी वो खुद को निर्दोष बताती है लेकिन उनके पास इतनी ताकत नहीं है कि वह खुद को बचाने के लिए के केस लड़ सकें जिस तरह दुती चंद ने किया. आपको जानकर हैरानी होगी कि शांति ने खुदकुशी की भी कोशिश की थी.


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ओलंपिक में जिस तरह से केवल महिलाओं के लिंग परीक्षण पर जोर दिया जाता है वह खेल भावना को प्रभावित करता है, साथ ही खिलाड़ी के मनोबल को भी गिराता है. इस परीक्षण में असफल होने के बाद कई खिलाड़ियों की जिंदगी खराब हो गई…Next


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